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भूत-प्रेत झाड़फूंक पर सरकारी मुहर, पटना के कलेक्ट्रेट घाट पर लगता है भूत मेला

पटना डीएम के दफ्तर से सटे गंगा घाट  पर हर शनिवार को लगता है भूत मेला .

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सिटी पोस्ट लाईव : अगर किसी जंगल में या फिर किसी सुदूर गावं देहात में भूत मेला लगे तो आप कह सकते हैं कि यह अंधविश्वास है. गावं के अनपढ़ लोगों को भूत प्रेम के नाम छले जाने का तरीका है. लेकिन यब राजधानी पटना के डीएम दफ्तर के सामने ही यह मेला लगाने लगे तो आप इसे आप क्या कहेगें ? सचमूच भूत प्रेत होता है ? डीएम दफ्तर के बाहर अजीबो-गरीब तरीके से भूत भगाने में जुटे ओझा को आप काबिल और गुनी मानेगें ? पता नहीं आप क्या सोंच रहे होंगें ? लेकिन ये सच है .पटना डीएम के दफ्तर से सटे गंगा घाट  पर हर शनिवार को लगता है भूत मेला . इस भूत मेले में जूत्ते हैं हजारों लोग .खुल्लेयाम होता है  भूत भगाने के नाम अजीबो गरीव अमानवीय कार्य . कोई ओझा यहाँ आपको महिला की धुनाई करता नजर आएगा तो कोई मसूं नन्हे बच्चों के साथ दिल दहला देनेवाला अमानवीय व्यवहार करता दिखेगा .

गावं में जब भी कोई बीमार होता है तो ईलाज कम झाडफूंक ज्यादा होता ,इस बात का प्रमाण है यह मेला. इसमे आनेवाले ज्यादातर लोग गंभीर बीमारियों से ग्रसित होते हैं. कोई गंभीर बिमारियों का शिकार तो कोई पागलपन का . इन्हें जरुरत है द्क्तारी ईलाज की लेकिन ईनका ईलाज कर रहे हैं  झूठ फरेब और भूत कर डर दिखाकर लोगों को डराने वाले ये फर्जी ओझा-गुनी . यहं आनेवाले लोगों को विश्वास है कि गंगा घाट पर बैठकी लगाने से और ओझा गुनी की झाडफूंक से भूत भाग जाता है. यहीं कारण है कि राजधनी के इस  कलेक्ट्रेट घाट पर अपने  परिवार के साथ भूत भगाने भगत के साथ लोग पहुंचते हैं.

राजधानी पटना में जब यह सब हो रहा है तो राज्य के दूसरे हिस्सों का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है . राज्य में डायन प्रथा  निषेध कानून तो 1999 में ही बना लेकिन महाराष्ट्र या कर्नाटक जैसा विशिष्ट कानून नहीं है. अंधविश्वास के तहत होने वाला आपराधिक कृत्य भारतीय दंड विधान और दंड प्रक्रिया संहिता की संबंधित धारा के तहत ही डील होता है. विज्ञान के युग में बीमारी का इलाज झाड़-फूंक, टोना-टोटका से होना ही नहीं चाहिए.लेकिन यहाँ तो  अंधविश्वास पर सरकारी मुहर लगाने का काम हो रहा है . वैसे भी अंधविश्वास की परिभाषा जादू-टोना, चमत्कार व दैवी-शक्ति का दावा करना, मानसिक रोगियों पर भूत की बात कह उन्हें उत्पीड़ित करना, वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति पर रोक लगाना ही है. फिर यहाँ क्यों ये सब खुल्लेयाम होने दिया जाता है ? क्या आस्था, विश्वास और परंपरा के नाम पर लोग कुछ भी करते रहेगें और सरकार कान में तेल डाल आँखें मूंदे सोई रहेगी . कानून तो  भूत भगाने के नाम पर प्रताड़ना, मल पिलाना, नर बलि, सांप-कुत्ता के काटने, बिच्छू के डंक मारने पर डाक्टरी परामर्श के बदले झाड़-फूंक, भ्रूण के लिंग परिवर्तन जैसे दावे को रोकने के लिए बनाया जाना चाहिए .कई राज्यों में ऐसे कानून पहले से ही है.

लोकसभा ने ‘द प्रिवेंशन ऑफ विच हंटिंग बिल-2016’ बनाया. बिहार में ऐसा ही कानून 1999 में, झारखण्ड में 2001 में बना. 2016 का कानून, खुद को ओझा बताने वाले को 1 से 3 साल की सजा, 25-50 हजार तक जुर्माना या दोनों का प्रावधान करता है. किसी स्त्री को डायन बताने, डराने धमकाने, मारने पीटने पर 3 से 5 साल की कैद, 25-50 हजार का जुर्माना है. नकद रकम पीड़िता को दिया जाना है.लेकिन बिहार की राजधानी में तो ऐसे अंध विश्वास और झाड-फूंक और भूत भगाने की परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है. इस धंधे पर सरकारी मुहर लगाईं जा रही है,इसे खुल्लेयम करने की छोट देकर .

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